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25 नवम्बर का इतिहास

♓🅰♉🚩🅾♏ *भारतीय एवं विश्व इतिहास में 25 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ।* ☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆ 1667 - रूस के उत्तरी कॉकसस क्षेत्र के सेमाखा में ...

Sunday, 25 February 2018

कुछ दिल की बात आपके साथ।

हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों की खातिर।
उन चंद चतुर लोगों की बेहिसाब चतुराईयों के खातिर।।
यह वक्त हिसाब से अपने बदले या ना बदले।
हमें उठकर बदलना होगा वक्त को उन शातिर भाइयों के खातिर।।
*हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों के खातिर---2*

गुनाहों का दौर  शुरू कर उसने, मिटाने शुरू कर दिए अपने परछाइयों को फिर।
मर ना जाए फिर से कोई निर्बल बेसहारा हो कर,
चंद नोटों के बंडल के रुसवाइयों के खातिर ।।
*हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों के खातिर ---2*

टूट पड़ रहे है घर- घर से अब भी लोभी, सपने हवाईयों के खातिर।
दु:ख तो खुद झेल सकते नहीं पर दुःख दे रहे हैं चंद बंडल रुपयों की खातिर।।
*हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों के खातिर ---2*

अंजाम दे दे ना फिर से कोई छुप कर बुरा, निर्बल बेसहारों के ऊपर नकाब पहन कर फिर।
नकाब धारियों को हमें पकड़ना होगा,बेचारी के रूसवाइयों के खातिर।।
*हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों के खातिर ----2*

सुना है भाव नहीं मिलता यहाँ आपके दर्द और रुसवाइयों के खातिर।
टूट -टूट कर कितना जिंदा रहेगी बेचारी, फांसी लगा लेगी या तंग आकर खा लेगी गोलियाँ फिर।।
*हमें फिर से लड़ना होगा उन बुराइयों की खातिर ---2*

           *----हरि ओम्।*

Friday, 9 February 2018

आंग्ल प्राच्य विवाद अथवा प्राचीन पाश्चात्य विवाद---

*आंग्ल प्राच्य विवाद अथवा प्राच्य पाश्चात्य विवाद
*आंग्ल प्राच्य विवाद अथवा प्राचीन पाश्चात्य विवाद---*

      1813 के आज्ञा पत्र के अनुसार भारत में जनसाधारण की शिक्षा का संपूर्ण दायित्व कंपनी का था तथा इस कार्य हेतु प्रतिवर्ष ₹100000 की धनराशि सुरक्षित कर दी गई थी। इसके लिए 1823 ईसवी में एक 'लोक शिक्षा समिति' की स्थापना की गई। इस लोक को शिक्षा की सामान्य समिति में 10 सदस्य थे। उनमें दो दल थे। एक प्राच्य विद्या समर्थक दल था, जबकि दूसरी ओर आंग्ल था जो अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में समर्थन था।  यह विवाद 20 वर्षों तक चलता रहा। यह विवाद विस्तृत रूप में इस प्रकार था। आंग्ल प्राच्य विवाद कि वास्तव में कुछ कारण थे --- जैसे----
!) 1813 का आज्ञा पत्र की धारा 43 में वर्णित शब्दों-- 'साहित्य',
'भारतीय विद्वान', भारतीय भाषा व निवासी आदि की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई थी।
!!) इस राजपत्र में शैक्षिक विकास हेतु ₹100000 की धनराशि की पेशकश की गई थी।
           किंतु इन दोनों बिंदुओं से संबंधित अनेक विवादास्पद प्रश्न दोनों दलों के लोगों द्वारा उठाए जाने लगे तथा दोनों ही समूह के द्वारा तर्कपूर्ण पत्र प्रस्तुत किए जा रहे थे , जिसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
        प्राच्य विद्या समर्थक दल का नेता एच.टी. प्रिंसेस था तथा कुछ विद्वान जैसे- लॉर्ड मिंटो, एच. विल्सन आदि भी इस वर्ग का समर्थन कर रहे थे। यह सभी लोग प्राचीन भारतीय साहित्य के समर्थक थे तथा चाहते थे कि भारत में शिक्षा का प्रसार -प्रचार भारतीय स्थानीय भाषाओं के माध्यम से हो तथा धारा 43 में वर्णित 'साहित्य' शब्द को यह अपने मतानुसार भारतीय प्राचीन साहित्य के रूप में ग्रहण कर रहे थे।
        यह दल भी दो दलों में विभक्त हो गया। पहले दल का प्रतिनिधित्व भारत के हितैषी लोग कर रहे थे, जो वास्तव में भारतीयों के हित में तर्क प्रस्तुत कर रहे थे जबकि दूसरी भाग के प्रतिनिधि ब्रिटिश हित की बात कर रहे थे।
             भारतीयता व उनके हितों की बात करने वाले दल के व्यक्तियों का मानना था कि भारत में जब भारतीय धर्म, दर्शन और साहित्य की शिक्षा दी जाए तो ही यहां के नागरिकों वा देश का विकास हो पाएगा। उन्होंने शिक्षा के माध्यम के रूप में संस्कृत, अरबी व फारसी जैसे भाषाओं का समर्थन किया। प्रिंसेस का तर्क था कि यदि भारतीयों को बलपूर्वक अंग्रेजी भाषा पढ़ाने का कार्य दिया जाएगा तो उनके विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा।
            इसके विपरीत ब्रिटिश हित साधने वाले व्यक्तियों का मत था कि भारत में पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देना अव्यवहारिक है। इसके अतिरिक्त कुछ का मत था कि भारतीय पश्चात्य ज्ञान, भाषा साहित्य और ज्ञान विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने योग्य नहीं है।

नैतिकता का अर्थ विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।
          अंततः स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित हो गया था कि प्राच्यवादी दल के ब्रिटिश हित साधने वाले व्यक्ति भारतीय ज्ञान विज्ञान को भारत में संचालित करने के पक्ष में इसलिए थे, ताकि भारतीय जनता का विकास ना हो सके तथा वह ईसाई धर्म व संस्कृति अपनाने हेतु विवश ना हो सके।
      पाश्चात्यवादी दल में भी भारत के हित व ब्रिटिश हित दो प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित थे। भारत के हित को देखते हुए राजा राममोहन राय जैसे विद्वान पाश्चात्य भाषा व शिक्षा पद्धति को भारत में प्रचलित करने के पक्षधर थे, ताकि भारतीय जनता भी अंग्रेजी शिक्षा व ज्ञान -विज्ञान का अध्ययन कर सके।  जबकि ईसाई धर्म को मानने वाले अंग्रेजों का मत था कि यदि भारतीय को अंग्रेजी शिक्षा प्रदान की जाएगी, तो भारत में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी भाषा, ईसाई धर्म व पाश्चात्य संस्कृति का प्रसार -प्रचार होगा व भारतीय संस्कृति का अंत हो जाएगा। क्योंकि अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करना कुछ महँगा था। इसलिए केवल उच्च वर्ग की भारतीय ही अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे।
             यह संपूर्ण विवाद लगभग 20 वर्षों के लंबे काल तक चला तथा 1834 में अंततः इस विवाद के अंत हेतू ब्रिटेन सरकार की ओर से लार्ड मैकाले भारत आया।


नैतिकता का अर्थ--

*नैतिकता का अर्थ--* साधारण भाषा में कहा जा सकता है कि परिवार, समाज व समूह के नैतिक नियमों का अनुपालन करना ही नैतिकता है। नैतिकता के अंतर्गत समाज द्वारा निर्धारित व्यवहार और आदर्श आते हैं, व्यक्ति के कार्य और व्यवहार नैतिकता से संबंध हो जाते हैं। नैतिकता की कोई निर्धारित परिभाषा नहीं दी जा सकती, इसके विकास में विद्यालय और अध्यापक, परिवार, पड़ोस, समूह, समुदाय और समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
                   नैतिकता से अभिप्राय सामाजिक समूह के नैतिक नियमों को स्वीकार करने से है।MORAL शब्द लैटिन भाषा में MORES शब्द से निकला है। जिसका तात्पर्य है रीति, रिवाज अथवा लोकरीति। नैतिक रुप से कार्य करने का अर्थ है --- समूह में आचरण के प्रति आस्था होना और और अनैतिकता से तात्पर्य है-- सामाजिक आदर्शों का पालन करने में असमर्थ होना । अनैतिक व्यवहार समूह के अनुरूप नहीं होता । इसका यह अर्थ नहीं कि उसमें व्यक्ति की हानि होती है अथवा व्यक्ति जानबूझकर अनैतिक कार्य करता है, अपितु सामाजिक मर्यादाओं का ज्ञान ना होना भी इसका कारण है।
                  नैतिकता सामाजिक नियंत्रण का साधन है। सामाज - सम्मत व्यवहार तथा आदर्शों का सम्मिलित रुप ही नैतिकता का स्वरूप धारण करता है।  समाज के आदर्शों के प्रति स्वेच्छा से आचरण करना इसका ध्येय है। बाहर से अंदर की ओर अधिकार की पुष्टि ही इसका ध्येय है।भय ना होकर स्वेच्छा ही इसके आचरण का आधार है। व्यक्ति की भावनाएं कार्य से जुड़ जाती है। किसी भी कार्य को करते समय व्यक्ति यह सोचता है कि यह कार्य अनैतिक तो नहीं है। नैतिकता इतनी जटिल होती है कि वह बच्चों में नहीं पाई जाती। नैतिकता में दो प्रकार के उच्चतम दृष्टिकोण निहित होते हैं-- 1)-: बौद्धिक,  2)-:स्नायुविक। बालक को यह जानना आवश्यक हो जाता है कि  वह यह जाने कि सच क्या है और क्या झूठ। क्या गलत है और क्या सही साथ ही उसमें यह भावना भी विकसित होनी चाहिए कि वह सही कार्य करें और गलत कार्य से बचें।
 एल्डरिच के अनुसार, "बालक जब भी किसी कार्य को करने की इच्छा करता है तो उसे समाज से स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है। जब भी सामाजिक नियमों और व्यक्तित्व व्यवहार में संघर्ष उत्पन्न है तब नैतिक रूप से परिपक्व व्यक्ति उसके संतोष के लिए संघर्ष की स्थिति को कुशलतापूर्वक संभाल लेता है। संज्ञान का अर्थ" जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

संवेग का अर्थ---

*संवेग का अर्थ---*
 संवेग प्राणी का वह आंतरिक अनुभव है, जिसमें उसकी मानसिक स्थिति को एक उथल- पुथल प्रवृत्ति के रूप में व्यक्त होती है। हम संवेग को प्रायः मूल प्रवृत्ति ही समझ लेते हैं, किंतु ऐसा मानना उचित नहीं है । इसमें कोई संदेह नहीं कि संवेग भी मूल प्रवर्ति है, किंतु दोनों में भिन्नता है। जहां मूल-प्रवृत्ति क्रियात्मक है, वही संवेग भावात्मक प्रवर्ति है ।
    संवेग का अंग्रेजी रूपांतरण 'EMOTION' है । जो लैटिन शब्द'EMOVERE' से बना है, जिसका अर्थ उत्तेजित करना होता है। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि संवेग व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था का दूसरा नाम है। वास्तव में संवेग एक जटिल अवस्था है। जिसमें कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे -- हृदय गति में परिवर्तन, रक्तचाप में परिवर्तन आदि होती हैं। इनके अलावा शरीर के बाहरी अंगों,  जैसे-- हाथ,पैर , आंख, चेहरा आदि में भी कुछ परिवर्तन हो जाते हैं। जिसे देखकर यह समझा जा सकता है कि बालक संवेग की स्थिति में है । संवेग कि शारीरिक प्रतिक्रियाएं, अभिव्यंजक व्यवहार के अलावा एक आत्मनिष्ठ भाव भी होता है। सामान्यतः किसी भी संवेग में सुखद या दुःखद के भाव की अनुभूति पाई जाती है। जैसे-- भय में दुखद भाव की अनुभूति तथा खुशी में सुखद भाव की अनुभूति होती है। यही बात अन्य संवेगों की स्थिति में भी पाई जाती है।

Thursday, 8 February 2018

अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थ

*अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थ--*
 बालक के संवेगों के विकास पर ही बालक का शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक विकास निर्भर होता है। शिक्षा का कार्य है कि सभ्य, सुशिक्षित, संस्कारित,अनुशासित और बहुआयामी व्यक्तित्व वाले नागरिकों का विकास करें। उचित रूप से संवेगों का प्रदर्शन व नियंत्रण करने में सफल बालक स्वयं और समाज दोनों के लिए हितकारी होते हैं। संवेगों के प्रशिक्षण में अध्यापकों की प्रमुख भूमिका होती है। बालक का व्यवहार उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है और व्यवहार और व्यवहार संवेगों की उपस्थिति से प्रभावित होता है। संवेगों का उचित विकास नहीं होता है तो बालक का संपूर्ण व्यक्तित्व विघटित हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि अध्यापक विद्यार्थियों के संवेगात्मक विकास में सहायक बने। अतः अध्यापक को बालक के संवेगात्मक विकास और संवेग प्रशिक्षण विधियों से अवगत होना आवश्यक है। तभी वह अपने दायित्वों को पूर्ण करने में सफल हो सकता है। _अध्यापकों के लिए संवेगात्मक विकास के निहितार्थों को निम्न बिंदुओं में प्रस्तुत किया जा सकता है---:_
1-: अध्यापक को शिक्षण की ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें विद्यार्थी खुलकर अपने संवेगों की अभिव्यक्ति कर सकें और उनके मन में शैक्षणिक गतिविधियों के प्रति व्याप्त भय वा चिंताएँ दूर हो सकें।
2-: विद्यार्थियों को अपने संवेगों की अभिव्यक्ति के प्रोत्साहित करना अध्यापकों का कर्तव्य है और इसके लिए अध्यापकों को ऐसे अवसर सृजित करना चाहिए जिससे विद्यार्थियों की झिझक समाप्त हो सके।
3-: अध्यापकों को ध्यान रखना चाहिए कि बालक के संवेगों के विकास किए बिना उसका बौद्धिक विकास करना संभव नहीं है। अध्यापक को अपने अंदर यह क्षमता पैदा करनी चाहिए कि वह कक्षा के बाहर विषम परिस्थितियों में भी अपना भावनात्मक संतुलन बनाए रखें तथा तथा सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं. जिससे वह बालकों के साथ समुचित व्यवहार कर सकेगा।
4-: अध्यापकों को चाहिए कि विद्यार्थियों के माता-पिता से निरंतर संपर्क बनाएँ रखें। विद्यार्थियों के संवेग प्रशिक्षण में माता पिता का सहयोग प्राप्त करने के साथ-साथ विद्यार्थियों की शारीरिक कमजोरियों , न्यूनताओ, बीमारियों आदि से अवगत हो,  जिससे विद्यार्थियों के लिए उचित निर्देशन एवं परामर्श दे सके।
5-: अध्यापकों को माता-पिता को स्पष्ट रूप से अवगत कराना चाहिए कि बालकों के संवेगात्मक विकास पर पारिवारिक वातावरण का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। बालकों को अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिए माता-पिता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
6-: अध्यापक की संबोधन क्षमता, वैयक्तिक आकृति, संयम, उत्साह, मानसिकता निष्पक्षता, शुभचिंतन, सहानुभूति बालक की संवेगों को प्रशिक्षित करने में सहायक होती है।
7-: पाठ्य सहगामी क्रियाओं का बालक के संवेगात्मक विकास में बड़ा योगदान होता है । इन कार्यक्रमों के द्वारा बालकों को आत्माभिव्यक्ति, स्वयं को तथा दूसरों को जानने की समझदारी ,स्वयं की रुचियों को व्यापक बनाने, स्वयं के कार्यों को नियंत्रित करने की अवसर प्राप्त होते है। अध्यापकों को पाठ्य सहगामी क्रियाओं की आयोजन में विशेष रुचि लेनी चाहिए ।
8-:गृह कार्य प्रदान करते समय अध्यापकों को बालकों की आयु और व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखना चाहिए
9-: अध्यापक को शिक्षण विधियों का चयन और शिक्षण कार्य में यह ध्यान रखना चाहिए कि बालक की संवेगात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

*संवेगों की विशेषताएं*

*संवेगों की विशेषताएं*---- :   संवेगों की मानव जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है. संवेगों की प्रकृति भावनात्मक होती है जो व्यक्ति को क्षणिक उत्तेजना प्रदान करते हैं। संवेगो को व्यक्ति के मुख-मुद्रा, वाणी तथा अन्य व्यवहार के अवलोकन से पहचाना जा सकता है। *संवेगों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है---*
1-: संवेगों में व्यापकता पाई जाती है। संवेग पशु-पक्षी, बालक वृद्ध,  सभी में पाए जाते हैं।
2-: मनुष्य की सभी दशाओं एवं अवस्थाओं में संवेग पाए जाते हैं।
3-: संवेगात्मक अनुभूतियों के साथ-साथ कोई ना कोई मूल प्रवृत्ति अथवा मूलभूत आवश्यकता जुड़ी रहती है।
4-: सामान्य रूप से संवेग की उत्पत्ति प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से होती है ।
5-: किसी भी संवेग को जागृत करने के लिए भावनाओं का होना आवश्यक है।
6-:प्रत्येक संवेगात्मक अनुभूति व्यक्ति में कई प्रकार के शारीरिक और शरीर संबंधी परिवर्तनों को जन्म देती है।
7-: संवेग में अस्थिरता पाई जाती है।
8-: संवेग मनोशारीरिक होता है।
9-:संवेग की दशा में बुद्धि काम नहीं करती है।
10-: संवेग पर परिस्थिति और ग्रंथियों का प्रभाव पड़ता है।
11-: संवेग का प्रकाशन हर एक व्यक्ति व्यक्तिगत ढंग से करता है।
12-: संवेग का परिणाम कोई क्रिया अवश्य होती है।
13-: प्रशिक्षण, ज्ञान ,अनुभव की वृद्धि आदि के परिणाम स्वरुप मनुष्य में विशेषकर संवेगों का स्थानांतरण होता है।

Sunday, 4 February 2018

राष्ट्रभाषा

*राष्ट्रभाषा*
        भाषा का दूसरा रूप 'राष्ट्रभाषा' का है। राष्ट्रभाषा वह होती है, जो देश के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली जाती हो और जिसमें राष्ट्र के निवासी परस्पर विचारों का आदान प्रदान करते हो। स्वतंत्रता के पूर्व भी भारत की राष्ट्रभाषा सही मायने में हिंदी थी। हिंदी में ही धुर दक्षिण में स्थित रामेश्वरम् के आसपास के लोग भारतीयों का स्वागत करते थे, भारत के अनेक तीर्थो में लोग किसी भाषा का व्यवहार करते थे। कोलकाता, मुंबई, कराची, लाहौर आदि नगरों में यह भाषा अपरिचित नहीं थी। हमारे राष्ट्र भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन था --14 सितंबर 1949। उस दिन भारतीय संविधान-- सभा ने सर्वसम्मति से स्वतंत्र भारत गणतंत्र- संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकारा था । उस दिन तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, पंजाबी, हिंदी, बांग्ला, असमिया और उड़िया को राज्यों की राजभाषा के रूप में स्वीकारा था। इसी राज्य की राजभाषा वर्ग में कोंकणी, नेपाली, मणिपुरी को भी सम्मिलित किया गया है । संविधान के इसी राजभाषा वर्ग में संस्कृत, उर्दू तथा सिंधी भाषा को राष्ट्रभाषा रूप में स्वीकारा गया है।