HOME

Featured post

25 नवम्बर का इतिहास

♓🅰♉🚩🅾♏ *भारतीय एवं विश्व इतिहास में 25 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ।* ☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆ 1667 - रूस के उत्तरी कॉकसस क्षेत्र के सेमाखा में ...

Thursday, 10 September 2020

खरवारों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य।

 खरवार

---)) खरवार की अधिकतर संख्या पलामू, रांची तथा हजारीबाग में थी।

---)) खरवार परंपरा के अनुसार वे खेरीझार से आते थे , इसलिए खरवार कहलाये।

-)) खरवारों का प्रमुख पेशा कृषि धर्म था।

-))) इनमें बाल विवाह को श्रेष्ठ माना जाता है।वधू मूल्य देने की प्रथा थी।

-)) खरवारों की अपनी पंचायत होती थी।जिसके सदस्य गांव के ही वरिष्ठ पुरुष होते थे।

-)) कई गांव मिलकर चट बनता था जिसका प्रमुख प्रधान कहा जाता था। इसका पद वंशानुगत होता था।

-))) खरवारों में घुमकुरिया जैसी कोई संस्था नहीं थी।

-)) कोई स्त्री निःसंतान थी तो उसकी बहन का विवाह जीजा के साथ हो सकता था। ऐसे विवाह को 'रिजनिया' कहा जाता था।

-))) पलामू तथा रांची में खरवार ग्राम पंचायत का प्रमुख मुखिया कहा जाता था, किंतु शाहाबाद में उसे बैगा ही कहते थे।

-))) बैगा ही प्रत्येक गांव में फसल बोने अथवा काटने का शुभारंभ करता था।

-)) खरवार मुखिया गांवों से हूं राजस्व एकत्रित कर जमींदार को देता था।

--)) खरवार पंचायत एक सर्वमान्य संस्था थी और 1947 ई तक खरवारों के अधिकांश पारस्परिक झगड़े पंचायत स्तर पर ही निपटा लिए जाते थे।

--)) 

Tuesday, 8 September 2020

टाना भगत आंदोलन



              टाना भगत आंदोलन(1914)
-) टाना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म 1888 ई में गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के अंतर्गत चिंगरी नावाटोली में हुआ था।
-) पिता का नाम कोहरा भगत और माता का नाम लिबरी भगत था। पत्नी बुधनी भगत थी।
-) प्रत्येक वर्ष गांधी जयंती के दिन चिगरी नावाटोला में इनकी जयंती मनाई जाती है।
-) इनको आत्म बोध की प्राप्ति 1914 ई में गुरु ग्राम हेसराग के श्री तुरीया भगत से तंत्र -मंत्र की विद्या सीखने के क्रम में हुआ।
-)टाना भगत आंदोलन की शुरुआत अप्रिल 1914 ई में हुई।
-) टाना शब्द का अर्थ है टानना या खींचना।
-) टाना भगतों की अधिकांश आबादी बिशनपुरा,घाघरा, गुमला,रायडीह, चैनपुर,पालकोट,सिसई, लापुंग,कुडूं तथा मांडर में केन्द्रित है। इनकी कुल संख्या प्रायःदस हजार है जो लगभग 150 परिवारों में विभक्त है।
-) टाना भगत मांस खा सकते थे मांसभक्षी भगत जुलाहा भगत कहे गये ये मांडर क्षेत्र में पाते जाते है। जिन लोगों ने शिबू भगत का अनुखरण नहीं किया वे अरूवा भगत कहलाये क्योंकि वे केवल अरवा चावल ही खाते थे।
-) घाघरा क्षेत्र में बेलगाडा़ निवासी बलराम भगत ने भगत सम्प्रदाय की बागडोर संभाली।
-) बिशनपुर थाना के उरावां ग्राम के भीखू भगत ने बिष्णु भगत सम्प्रदाय को जन्म दिया।
-) 1961 में जतरा भगत को जेल हुई और इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने सिद्धांतों का प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाते रखेगा।पर जेल में मिली प्रताड़ना की वजह से दो मास के भीतर उसकी मौत हो गई।
-) आंदोलन नहीं रूका और 1916 के अंत तक रांची जिला के दक्षिण पश्चिम भागों से मध्य भाग होते हुए विशेषतः बेड़ी,कुडुं,मांडर, थानों में तथा उत्तर में पलामू जिला तक फैला।

-)भगतों ने राजा के समक्ष चार प्रस्ताव रखा ---


1----उन्हें स्वशासन प्रदान किया जाय।
2------राजा का पद समाप्त किया जाय।
3------समानता स्थापित किया जाय।
4-------भूमि कर समाप्त किया जाय।
-) महात्मा गांधी ने 1921 ई में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारंभ किया तो कुडुं थाना के सिद्धु भगत के नेतृत्व में टाना भगत पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये।
-) टाना भगतों में केवल उरांव ही नहीं है उनमें मुंडा और खड़िया भी शामिल हैं।फिर भी सबसे ज्यादा संख्य में उरांव ही हैं।
-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)-)

बिरसा आंदोलन

 बिरसा आंदोलन



-)बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 ई को हुआ था।
-) उन दिनों तमाड़ थाना क्षेत्र के उलिहातू में हुआ था।
-) पिता सुगना मुंडा थे और माता कदमी मुंडा थी। इनके बड़े भाई का नाम कोंता मुंडा था।
-) इनका मामा घर अयुबहातू था और नाना जी डिबर मुंडा थे। मौसी जोनी मुंडा अपने साथ ससुराल खटांगा ले गयी।
-) गौडबेडा के आनंद पांडा के सर्म्पक में आया। जहां उस पर बैष्णव धर्म का प्रभाव पड़ा।
-) सबसे पहले बिरसा ईसाई धर्म प्रचारक के सम्पर्क आया।
-) कुंदी बरटोली में बिरसा की भेंट एक जर्मन पादरी से हो गई ,जो उसे बारजो ले गया, जहां पर उसने निम्न प्राथमिक परीक्षा में उत्तीर्ण का प्राप्त की।
-) चालकद बिरसा के अनुयायियों का तीर्थ स्थल है।
-) बिरसा ने चाईबासा से उच्च प्राथमिक स्तर की परीक्षा 1890 ईसवी में पास की।
-) सिंहभूम के संकराग्राम की एक युवती से बिरसा का विवाह हुआ पर बाद में उन्होंने यह विवाह का रिश्ता तोड़ दिया।
-) बिरसा ने लोगों से सिंगबोंगा की उपासना करने का आग्रह किया।
-) बिरसा के वारंट की तामीली का काम पुलिस डिप्टी सुपरिंटेंडेंट जी०आर ०के० मेयर्स को सौंपा गया था।
-) बिरसा आंदोलन का द्वितीय चरण  तब शुरू हुआ जब 1897 ईस्वी के उत्तरार्ध में बिरसा तथा उसके 15 अनुयायियों को हजारीबाग जेल से महारानी विक्टोरिया के शासन के हीरक जयंती के अवसर पर सजा की मियाद पूरी होने के कुछ दिन पहले छोड़ा गया था।
-) 1898-99 ईसवी में संपूर्ण मुंडा प्रदेश में अकाल एवं महामारी का प्रकोप हो गया , जिसका बिरसा ने फायदा उठाते हुए लोगों को सहयोग करते हुए एकजुट किया और अपने विद्रोह की तैयारी करते हुए लोगों को संगठित किया।
-) बिरसा के सेना का मुख्यालय खूंटी में था।
-) 28 जनवरी 1900 को दो मुंडा सरदारों डोंका मुंडा और मांझिया मुंडा ने 32 विद्रोहियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।
-) बिरसा मुंडा को पकड़ने के लिए ₹500 के इनाम की घोषणा की गई थी।
-) बनगांव के जग मोहन सिंह के आदमियों वीर सिंह महली आदि ने इनाम के लालच में बिरसा को 3 मार्च 1980 को पकड़ा दिया।
-) मुकदमा के दौरान ही जेल में बंद बिरसा का 9 जून 1980 को निधन हो गया।
-) 1902में गुमला तथा 1903 में में खूंटी अनुमंडल खोले गए।
-) बंगाल काश्तकारी कानून की जगह 11 नवंबर 1908 ईस्वी को छोटानागपुर काश्तकारी कानून लागू किया गया।
-)

संथाल-हुल विद्रोह(1855-56)

संथाल-हुल विद्रोह 1855-56

-/1836 ईसवी तक दामिन ए कोह में संथाल गांवों की संख्या 427 तक हो गई और इन्होंने ने ही 1855 ईसवी की हुल में भाग लिया।
-/1855 ईसवी के आरंभ में 6-7 हजार संथाल विरभूम, बांकुड़ा छोटानागपुर-खास और हजारीबाग से एकत्रित हुए। भगनाडीह के चुन्नू मांझी के चार बेटों सिद्धू, कान्हू, चांद तथा भैरव ने संतालों को नेतृत्व प्रदान किया।
-/1855 ई के एक्ट 37 के अनुसार संथाल परगना जिला की स्थापना हुई।
-/ जुलाई 1855 ई में राजमहल की पहाड़ियों के संतालों का विद्रोह शुरू हुआ। 19 फरवरी 1856 में हजारीबाग के संतालों ने विद्रोह किया।
-/संथाल विद्रोह का वास्तविक विद्रोह अप्रिल 1856 ई में शुरू हुआ।
-/ अर्जून मांझी हजारीबाग के संतालों का महत्वपूर्ण नेता था।
-/ इस विद्रोह का दौर मार्च 1856 के प्रथम सप्ताह में शुरू हुआ जब संतालों ने खडगडीहा परगना के जगन्नाथडीह तथा चक्रडीह पर हमला किया और महाजनों तथा दुकानदारों को लूट लिया।
-/संभालो ने खड़गडीहा परगना में गुआ से 10- 12 किलोमीटर दक्षिण- पश्चिम में अखलापुर बाजार को 20 मार्च 1856 ईसवी में कुलियों, लक्ष्मी ठकुराइन तथा धर्मा के नेतृत्व में लूट लिया।
-/27 अप्रैल 1856 ई को विद्रोहियों के बीच से ही आए हुए 2 संथालो ने खड़गड़ीहा स्थित डिप्टी मजिस्ट्रेट से मुलाकात कर विद्रोहियों के नये नेता सेरजडीह का लुबई मांझी तथा गोवा, दोरूंदा,किस्को और बैरिया के विषय में खुलासा कर दिया। अतः 2 मई 1856 ई को कमिश्नर ने प्रिंसिपल असिस्टेंट के द्वार बंदी बनावा लिया।
-/संथाल विद्रोह और अंग्रेज अधिकारियों का पहला सीधा संघर्ष 29 अप्रैल 1856 ईस्वी को चतरोचट्टी में हुआ।
-/100रूपये के लोभ में जासूस टेक नारायण सिंह से सूचना पाकर 28 मई 1856 को अलेक्जेंडर ने भैरव मांझी को उसके गांव से गिरफ्तार कर लिया।जिसके बाद हजारीबाग में संथाल विद्रोह कमजोर पड़ गया।
-/₹100 के इनाम के लोभ में प्रताप सिंह ने 2 जून 1856 को संभाल नेता बुका मांझी को पकड़वा दिया।

Thursday, 9 April 2020

स्वामी दयानंद और आर्य समाज


इनका बचपन का नाम मूल शंकर था और जन्म 1824 ईसवी मौरवी गुजरात में हुआ था। २१ वर्ष की अवस्था में 1845 ईस्वी में घर से भाग निकले. स्वामी पूर्णानंद न 1848 ईस्वी में दयानंद सरस्वती नाम दिया। 1861 ईस्वी में मथुरा में इनकी भेंट अंधे स्वामी विरजानंद हुई। दयानंद सरस्वती इन के शिष्य बन गए। इन्होंने अपने गुरु से प्रतिज्ञा की कि मैं पूरे भारत में हिंदू धर्म एवं संस्कृति को प्रतिष्ठित करूंगा
1863 ईस्वी में अपने धर्म का प्रचार करने के लिए आगरा में इन्होंने पाखण्ड- खण्डिनी पताका फहराई तथा 1875 ईस्वी में मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की।1877 इस्वी में इन्होंने अपना मुख्यालय लाहौर को बनाया।
आर्य समाज पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। इन्होंने वेदों की ओर लौटो का नारा दिया। ये कठोर सुधारवादी थे। आर्य समाज ने छुआछूत, जाति व्यवस्था का विरोध किया परंतु वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया। हिंदू धर्म को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वामी जी ने 10 सिद्धांतों की स्थापना की।
१)-: वेद मंत्रों के आधार पर हवन किया जाना चाहिए.
२)-: मूर्ति पूजा का विरोध.
३)-: अवतारवाद एवं धार्मिक यात्राओं का विरोध।
४)-: कर्म सिद्धांत और आवागमन सिद्धांत का समर्थन.
५)-: निराकार ईश्वर की एकता में विश्वास.
६)-: स्त्री शिक्षा में विश्वास.
७)-: विशेष परिस्थितियों में विधवा विवाह की स्वीकृति.
८)-: बाल विवाह एवं बहु विवाह का विरोध.
९)-: हिंदी संस्कृति भाषा का प्रचार.
१०)-: सत्य केवल वेदों में निहित है इस कारण वेदो का अध्ययन परम आवश्यक है।
                        अंग्रेजों ने ब्रह्म समाज एवं आर्य समाज को प्रोत्साहन दिया था लेकिन दयानंद की लार्ड नॉर्थब्रुक से भेंट के बाद अंग्रेजों का दृष्टिकोण बदल गया। इसका कारण यह था कि नार्थबुक ने इन्हें अपने बातों के साथ-साथ विक्टोरिया का यशोगान करने के लिए कहा। उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया 1874 इस्वी में दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश प्रकाशित किया।केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से इन्होंने इसी हिंदी भाषा में लिखा।
            भारतीय समाज को धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए स्वामी दयानंद ने शुद्धि आंदोलन चलाया। जिसके द्वारा ईसाई बने हिंदुओं को वापस अपनी उनकी संस्कृति में लाया गया इन्होंने वेद भाष्य और वेद भाष्य भूमिका जैसी पुस्तकें भी लिखी। ये पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वराज शब्द का प्रयोग किया। इन्होंने ही पहली बार यह बताया कि विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए और भारत में बनी स्वदेशी वस्तुओं का ही प्रयोग करना चाहिए। यह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। 1882 में इन्होंने एक गौ रक्षा समिति बनाई. अजमेर में 30 अक्टूबर 1883 को इनकी मृत्यु हो गई. शिक्षा के क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय रहा।स्वामी ने भारत के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण व्यापक अज्ञानता को माना था।
           स्वामी जी की मृत्यु के बाद आर्य समाज में शिक्षा को अंग्रेजी और हिंदी भाषा में अपनाएं जाने के प्रश्न पर मतभेद हो गया लाला हंसराज अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने लाहौर में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज (डीएवी) की स्थापना की, जबकि स्वामी श्रद्धानंद  या मुंशीराम ने उन्हें हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल विश्वविद्यालय की नींव रखी।
1907 ईस्वी में लंदन टाइम्स की ओर से भारत के उत्तर पुथल की जांच करने आए वेलेंटाइन शिरोल ने आर्य समाज को भारतीय अशांति का जन्मदाता कहा।

Sunday, 2 February 2020

मिस्र सभ्यता नील नदी की देन।


मिस्र सभ्यता नील नदी की देन।


मिस्र की सभ्यता में नील नदी का बहुत महत्व है. अगर नील नदी ना होती तो मिस्र में सभ्यता का विकास भी नहीं हो पाता. प्राचीन काल में नील नदी को हापी कहा जाता था यह मध्य अफ्रीका की विक्टोरिया झील के पास से निकलती है और लगभग 700 मील का रास्ता तय करके तथा प्रति वर्ष बाढ़ का पानी और नई मिट्टी लाती हुई भूमध्य सागर में जा मिलती है। यह नदी बंजर चट्टानों में से सकरी उपजाऊ घाटी बनाती है, अपने साथ उर्वरा मिट्टी लाती है, जो इसके किनारों को उपजाऊ बना देती है और अंत में अपनी प्रति वर्ष बाढ़ से सिंचाई में निपुण साधन जुटाकर लोगों का जीवन सफल और सुखी बना देती है। मिस्र की प्राचीन सभ्यता इसी नील नदी की घाटी में पनपी थी। प्राचीन काल में नील नदी के उद्भव के बारे में किसी को भी जानकारी नहीं थी। कुछ अनुमानों के आधार पर कहा जाता है कि नील नदी उस पर्वत से निकलती है जो बादलों और घने कोहरे से ढका रहता है। अॉलमी ने पर्वत को चांद का पर्वत कहां है। स्टेनले ने इस पर्वत को रूबेनजोरी कहा है। जिसका अर्थ है "वर्षा करने वाला इंद्र पर्वत". इस क्षेत्र को आजकल इथियोपिया कहा जाता है। द्विती विश्वयुद्ध तक इसे अबीसीनया और प्राचीन काल में नूबिया‌ कहा जाता था। मिस्र की भूमि अधिक उपजाऊ है इसलिए प्राचीन काल से ही एक कृषि प्रधान देश रहा है।


           पिरामिड काल में यहां गेहूं,चावल, रुई,गन्ना पेपीरस विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियां उगाई जाती थी। डेविस ने लिखा है नील नदी समस्त युगों में मिस्र वासियों के जीवन तथा उसकी संपन्नता का साधन रही है । यही कारण है कि मिस्र जैसा रेगिस्तान प्रदेश इस नदी के कारण हमेशा हरा-भरा नजर आता है। प्राचीन मिस्र के लोग अपने देश को काला देश कहा करते थे, क्योंकि नील नदी की उपजाऊ मिट्टी काली होती थी। नील नदी की दो सहायक नदियां श्वेत तथा नीली भी बहती थी। यह नदियां मिश्र की भूमि को संपूर्ण वर्ष जल प्रदान करती थी। नील ने ही मिश्र को आर्थिक विकास, समृद्धि तथा विश्व में गौरवपूर्ण स्थान प्रदान किया। इसलिए इतिहास के जन्मदाता यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने मिस्र को नील नदी की देन कहा है ।मिस्र की भूमि हमेशा हरी भरी रहती थी। यहां के पशुओं को प्रचुर मात्रा में चारा उपलब्ध हो जाता था। नील नदी के मार्ग से मिस्र के लोग विदेशी व्यापार भी करते थे। नील नदी की घाटी से विभिन्न प्रकार की धातु और बहुमूल्य पत्थर सरलता से उपलब्ध हो जाते थे जिसके फलस्वरूप मिश्र का आर्थिक विकास अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया। क्योंकि मिश्र नदी में बहुत बाढ़ आती थी, इसलिए नील वासियों ने बाढ़ को रोकने के लिए और अपने भूमि को पूरे वर्ष जल प्रदान करने के लिए जल का संग्रहण करना आरंभ कर दिया। इसके लिए उन्होंने बांधों और नहरों का निर्माण कराया उन्होंने नील नदी के तट पर कई नगरों की स्थापना भी की। विदेशों के साथ व्यापारिक संबंध हो जाने के कारण यहां गणित, विज्ञान, ज्योतिष तथा कला का बहुत विकास हुआ।  एक विद्वान का विचार है कि यदि मिस्र में नील नदी नहीं होती तो वहां के लोगों का जीवन दूभर हो जाता क्योंकि गर्मियों के मौसम में यहां इतना तापमान बढ़ जाता है कि नदी, नाले, तालाब इत्यादि भी सूख जाते हैं। जल के अभाव में पेड़ पौधे तो क्या मनुष्य व जानवर भी सूखने लगते हैं। तपती गर्मी के समय नील नदी की धारा भी सूख कर पतली हो जाती है तथा खेत खलिहान भी सूख जाते हैं जब तक की गहरी खुदाई की सहायता से पानी ऊपर ना लाया जाए। कृषि करना असंभव होता है। परंतु अगस्त से अक्टूबर तक यहां खूब वर्षा होती है। नदी, नाले और तालाब पानी में लबालब डूब जाते हैं, जिससे दोबारा मनुष्यों में हर्षोल्लास लौट आता है और पशु तथा पेड़ पौधों में जान आ जाती है।

असीरियन सभ्यता के विषय में यहां पर क्लिक करके जाने

Friday, 29 November 2019

असीरिया की सभ्यता।


असीरिया की सभ्यता।
बेबीलोन के साम्राज्य की समाप्ति होने पर उसी क्षेत्र में एक दूसरी राष्ट्र का उत्थान हुआ। जिसका नाम असीरिया था। भौगोलिक दृष्टि से असीरिया दजला नदी के पूर्व और दक्षिण जेब के उत्तर का भूभाग है यह बेबीलोनिया की भांति पूर्णत‌ समतल ना होकर आंशिक तौर पर पहाड़ी क्षेत्र है, इसलिए यहां की जलवायु ज्यादा ठंडी है। असीरियन सोमेटिक जाति की एक शाखा थे और अक्कादी भाषा से मिलती-जुलती भाषा बोलते थे। बेबीलोन में राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर असीरिया, जिस पर बेबीलोन का अधिकार था, असुरदान(1183-1140ई पू) के नेतृत्व में स्वतंत्र हो गया। इस प्रकार कुछ ही वर्षों में मिस्र और पश्चिमी एशिया के प्रमुख देशों में नई राजवंशों की स्थापना हुई। जिसमें असीरिया सबसे शक्तिशाली साबित हुआ। वास्तव में 12 वीं शताब्दी ईसा पूर्व की प्रारंभ से लेकर सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक निकट पूर्व का इतिहास मुख्य रूप से असीरियन साम्राज्य का इतिहास है।