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25 नवम्बर का इतिहास

♓🅰♉🚩🅾♏ *भारतीय एवं विश्व इतिहास में 25 नवंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ।* ☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆☆ 1667 - रूस के उत्तरी कॉकसस क्षेत्र के सेमाखा में ...

Monday, 11 January 2021

सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए करेंट अफेयर संग्रह।

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• वह देश जिसने हाल ही में पाकिस्तानी महिलाओं के लिए मलाला यूसुफजई अधिनियम पारित किया है- अमेरिका।

• कोरोना वायरस संकट के कारण ब्रिटेन के पीएम बोरिस जॉनसन का इस माह का जिस देश का दौरा टल गया है- भारत।

https://youtu.be/3LKzu7hQE-c 




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• द क्रानिकल ऑफ फिलैंथ्रॉफी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 में दुनिया में सबसे ज्यादा दान जिस व्यक्ति ने दिया है- जेफ बेजोस

• जिस राज्य सरकार ने हाल ही में घोषणा की कि वह तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए एक तमिल अकादमी की स्थापना करेगी- दिल्ली

• आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में किसे नियुक्त किया गया है- अरूप कुमार गोस्वामी

https://youtu.be/3LKzu7hQE-c



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• किस राज्य सरकार ने ‘किसान सूर्योदय योजना’ लागू की है- गुजरात.
 

• हाल ही में किस देश ने मृत्युदंड को समाप्त कर दिया है- कजाकिस्तान.
 

• केंद्र सरकार ने देश के कुछ राज्यों में बर्डफ्लू के मद्देनजर राज्य सरकार द्वारा किए गए उपायों की निगरानी के लिए किस शहर में नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है- नई दिल्ली।

• किसने वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डब्ल्यूडीएफसी) के 306 किलोमीटर लंबे रेवाड़ी-मदार खंड का उद्घाटन किया- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
 

• भारत और किस देश द्वारा मध्यम रेंज की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (एमआरएसएएम) रक्षा प्रणाली का सफलापूर्वक परीक्षण किया- इजराइल।

 केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में भारत और जिस देश के बीच ‘निर्दिष्टर कुशल कामगारों' की सहभागिता से जुड़े समझौता ज्ञापन पर हस्ता क्षर की मंजूरी प्रदान कर दी- जापान।

• जिसे दूसरी बार अमेरिकी संसद प्रतिनिधि सभा का स्पीकर नियुक्त किया गया है- नैंसी पेलोसी।

 
https://youtu.be/3LKzu7hQE-c



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• हाल ही में जिस देश ने वर्ष 2015 के परमाणु समझौते का उल्लंघन करते हुए एक भूमिगत इकाई में 20 प्रतिशत तक यूरेनियम का संवर्द्धन शुरू कर दिया है- ईरान

 • हेमा कोहली ने जिस राज्य के चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ली है- तेलंगाना

• हाल ही में जिसने भारतीय सेना की मानवाधिकार सेल के प्रथम अतिरिक्त महानिदेशक (मानवाधिकार) का पदभार संभाला है- मेजर जनरल गौतम चौहान.
 

• संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अस्थायी सदस्य के तौर पर भारत का जितने साल का कार्यकाल 04 जनवरी 2021 से शुरू हो गया- दो साल
 

• प्रवासी भारतीय दिवस जिस दिन मनाया जाता है -9 जनवरी

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• जिस राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भुवनेश्वर में देश के पहले फायर पार्क का आनलाइन लोकार्पण किया- उड़ीसा।

• कोरोना महामारी के बीच दक्षिण कोरिया और जिस देश ने संयुक्त रूप से वायु सेनाभ्यास किया- अमेरिका।

• ब्लूमबर्ग की तरफ से जारी की जाने वाली अरबपतियों की सूची में जो दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए हैं- एलन मस्क।

• केंद्र सरकार ने लद्दाख में सिंधु नदी पर 144 मेगावाट की जितने जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है- आठ।

• हाल ही में जिस मशहूर फैशन डिजाइनर का तमिलनाडु के कोयंबटूर में निधन हो गया- सत्य पॉल।

• केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020-2021 में जीडीपी की विकास दर जितने प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है -7.7 प्रतिशत

 


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• केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए जितने करोड़ रुपये की मंजूरी दी- 28,400 करोड़ रुपये

• विश्व ब्रेल दिवस (World Braille Day) जिस दिन मनाया जाता है- 4 जनवरी।

• वियतनाम ने हाल ही में अपनी आकर्षक कीमतों के कारण जिस देश से खाद्यान्न, विशेषकर चावल खरीदना शुरू किया है- भारत

• जिसने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 05 जनवरी को कोच्चि-मंगलुरु प्राकृतिक गैस पाइपलाइन का उद्घाटन किया- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

• जिस राज्य के पौंग बाँध में रहस्यमय परिस्थितियों में 1700 से अधिक प्रवासी पक्षियों की मौत हो गई है- हिमाचल प्रदेश.

• अखिल भारतीय शतरंज महासंघ (एआईसीएफ) के नए अध्यक्ष जो बन गए हैं- डॉ संजय कपूर.

• वह खिलाड़ी जो टेस्ट क्रिकेट में न्यूजीलैंड के लिए सात हजार रन बनाने वाला तीसरा खिलाड़ी बन गया है- केन विलियमसन।

 


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• कोरोना के नए वायरस के खतरे को देखते हुए जिस देश में लगभग डेढ़ महीने के सख्त लॉकडाउन का ऐलान किया गया है- ब्रिटेन.

• जिस राज्य सरकार ने ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को तीन करोड़ रूपए देने की घोषणा की है- राजस्थान।

• जिस केंद्रीय मंत्री ने वर्चुअल एग्री इंडिया हैकाथॉन 2020 का उद्घाटन किया है- नरेंद्र सिंह तोमर.

• वह देश जिसने हाल ही में हिंद महासागर में पानी के अंदर ड्रोन का एक बेड़ा तैनात किया है- चीN.

• जिस राज्य सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने हेतु एक विशेष कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की है- उत्तर प्रदेश

• हाल ही में जिस देश ने अपने राष्ट्रगान में एक शब्द को बदल दिया है- ऑस्ट्रेलिया

 

• एशियाई विकास बैंक (एडीबी) असम में बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिये जितने करोड़ डॉलर का कर्ज देगा- 23.1 करोड़ डॉलर.

• जिस देश के प्रतिष्ठित गायक गेरी मार्सडन का 78 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है- इंग्लैंड.

• रेल मंत्रालय ने हाल ही में जिनके लिए किराए में मिलने वाली छूट को बंद कर दिया है- खिलाड़ियों को मिलने वाली छूट.

• एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने जिस राज्य में बागवानी को बढ़ावा देने के लिए 10 मिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं- हिमाचल प्रदेश.
 

• केन्द्रीय खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में जिस शहर में असम राइफल्स पब्लिक स्कूल (एआरपीएस) का खेलो इंडिया स्पोर्ट्स स्कूल के रूप में शुभारंभ किया- शिलांग.

• भारत में ब्रिटेन का उच्चायुक्त जिसे नियुक्त किया गया है - एलेक्जेंडर एलिस

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• जिस राज्य के खंडवा जिले में नर्मदा नदी पर बन रहे 600 मेगावाट वाले विश्व के सबसे बड़े तैरते हुए सौर ऊर्जा परियोजना से वर्ष 2022-23 से सौर ऊर्जा मिलने लगेगी- मध्यप्रदेश

• हाल ही में जिस देश ने वर्ष 2015 के परमाणु समझौते का उल्लंघन करते हुए एक भूमिगत इकाई में 20 प्रतिशत तक यूरेनियम का संवर्द्धन शुरू कर दिया है- ईरान.

• हाल ही में जिसने भारतीय सेना की मानवाधिकार सेल के प्रथम अतिरिक्त महानिदेशक (मानवाधिकार) का पदभार संभाला है- मेजर जनरल गौतम चौहान.

• हाल ही में जिस राज्य सरकार ने बर्ड फ्लू के कारण एवियन इंफ्लूएंजा वायरस के बढ़ते प्रकोप देखते हुए आपदा घोषित कर दिया है- केरल.

• कोरोना के बढ़ते कहर के बीच ब्रिटेन के बाद अब जिस देश ने दोबारा सख्त लॉकडाउन लागू करने का फैसला किया है- जर्मनी।

• आरबीआई ने हाल ही में जुर्माना वसूली और संग्रह गतिविधियों समेत विभिन्न दिशानिर्देशों के उल्लंघन को लेकर जिस पर 2.5 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया है- बजाज फाइनेंस लिमिटेड.

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करेंट अफेयर्स का जनवरी के प्रथम सप्ताह का वीडियो आप सबों के बीच है। हुई त्रुटियों के लिए खेद है पर जल्द ही सुधार लिया जाएगा।

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Sunday, 13 December 2020

ताना भगत आंदोलन, भाग--2

 


क्रमशः भाग ----2 गतांक से आगे।

भाग एक यहां से क्लिक कर पढ़े---: भाग एक यहां से ताना भगत आंदोलन झारखंड के आंदोलन में से एक।


5) आंदोलन का प्रचार-:
!)-हनुमान उरांव द्वारा प्रचार -:
ताना भगत आंदोलन के साथ एक अन्य व्यक्ति हनुमान और राम का भी नाम जुड़ा हुआ है। इनका जन्म स्थान भी जतरा भगत का ही गांव हो सकता है कि दोनों व्यक्ति एक ही रहे हो और एक नवीन संप्रदाय के बहादुर जनक के रूप में जतरा भगत का ही उपनाम हनुमान हो गया हो। एक समकालीन महिला, देवमानियां, जो सिसई थाना के बभुरी ग्राम के निवासी थी इस आंदोलन से संबद्ध थी उसने जतरा भगत की काफी सहायता की थी। जतरा भगत के नाम से जुड़े भक्ति गीत, देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत हैं, जिनसे विदेशी वस्तुओं के प्रति उनकी घृणा भावना प्रकट होती है। यही कारण है कि धीरे-धीरे यह आंदोलन जमींदार, मिशन तथा अंततः ब्रिटिश विरुद्ध विरोधी हो गया।
!!) शिबू भगत द्वारा प्रचार-:
झारखंड के मांडर क्षेत्र में शिबू भगत द्वारा आंदोलन का प्रचार प्रसार किया गया। उसके विषय में यह कथन प्रचलित है कि मृत्यु के कुछ दिनों बाद वह पुनर्जीवित हो उठा था और उसी के अनुसार लोगों ने समझा कि वह ईश्वर से साक्षात्कार कर के लौट आया है। उसने कहा भी था कि भगवान ने उसे ताना संप्रदाय के प्रचार प्रसार के लिए पुनः भेज दिया है। थोड़ी सफलता मिलने पर उसने दामोदर नदी के तट पर काले बकरे की बलि देकर उसके मांस को अपने अनुयायियों में वितरित कर दिया। उसने कहा कि आंदोलन का ध्येय प्राप्त हो चुका है और अब ताना भगत मांस खा सकते थे। जो मांसभक्षी भगत थे वे अब जुलाहा भगत कह गए और यह मांडर क्षेत्र में ही अधिकतर पाए जाते हैं। जिन लोगों ने शिबू भगत का अनुसरण नहीं किया। वे 'अरुआ भगत' कहलाये,क्योंकि वे केवल अरवा चावल का ही सेवन करते थे।
!!!) बलराम भगत द्वारा प्रचार-:
झारखंड घाघरा क्षेत्र में बेलगाडा, निवासी बलराम भगत में भगत संप्रदाय की बागडोर संभाली। उसने गो पूजन पर अधिक जोर दिया। उसने गायों बैलों को हालों में जोतना अनुचित बताया। बलराम के अनुयायियों ने खेती करना छोड़ दिया और पशुपालक बन गए। वे दूध का सेवन करने लगे और अतिरिक्त दूध, घी और दही बेचने लगे। गौरक्षणी भगत कहे जाने वाले यह लोग मुख्यता घाघरा एवं गुमला थानों में रहते हैं।
IV) भीखू भगत द्वारा प्रचार-:
बिशनपुर थाना के उरावां ग्राम के भीखू भगत ने विष्णु संप्रदाय को स्थापित किया। अन्य भगत नेताओं की तरह वह हुआ भी अंग्रेज विरोधी था। अतः सरकार द्वारा उसे भी बंदी बना लिया गया। उसने कहा कि ताना भक्तों से उसका कुछ भी लेना देना नहीं था और वह केवल विष्णु का भक्त था। उसका आंदोलन गुप्त रूप से चलता रहा। बृहस्पतिवार की रात बैठ के हुआ करती थी, जिसमें सभी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे।
         ताना भगत आंदोलन का प्रचार
जतरा भगत द्वारा प्रारंभ किया गया यह आंदोलन संपूर्ण उरांव प्रदेश में जंगल की आग की तरह फैल।  लोगों ने जमींदारों और अन्य गैर- आदिवासियों का काम पूरी तरह करना बंद कर दिया। अपने अनुयायियों को मजदूरी करने से रोकने के अपराध में जतरा भगत को उसके सात अनुयायियों के साथ गुमला के अनुमंडल पदाधिकारी की कचहरी में मुकदमा चलाने के लिए उपस्थित किया गया। 1916 ईस्वी में जतरा भगत को 1 वर्ष की सजा हुई और बाद में उसे इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने सिद्धांतों का कभी प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाए रखेगा। किंतु जेल में मिली घोर प्रताडना के फलस्वरुप जेल से बाहर आने के 2 माह के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार जतरा भगत नेपथ्य में चला गया किंतु उसका आंदोलन फलता फूलता रहा। रांची जिला के विभिन्न भागो में उसके किसी न किसी अनुयाई द्वारा नेतृत्व संभाल लिया गया। नए विचारों और नई मानसिकता से सामाजिक परिवेश इतना अनुप्राणित हुआ कि आंदोलन की प्रगति को अवरुद्ध करना कठिन हो गया। 1916ईं के अंत तक यह आंदोलन रांची जिला के दक्षिण-पश्चिम भागों में पश्चिम और मध्य भागों को लंघता हुआ उत्तरी भागों में फैल गया विशेषता बेड़ी,कुडु, मांडर थानों में। उत्तर की ओर यह पलामू जिला तक फैला।

भगतों के प्रस्ताव-:
भगतों द्वारा राजा के समक्ष चार प्रस्ताव रखे गये---
I) उन्हें स्वशासन प्रदान किया जाय।
II)राजा का पद समाप्त कर दिया जाये।
III) समानता स्थापित हो और
IV) भूमि कर समाप्त किया जाये क्योंकि भूमि ईश्वर प्रदत है। राजा ने उन मांगों को ठुकरा दिया जिससे टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गयी।यह आंदोलन सरगजा में भी फैला।

आंदोलन का प्रथम चरण

जहां ताना भगत का यह आंदोलन दो चरणों से होकर गुजरा, पहला चरण परिष्कार और परिहार से संबंध था अर्थात प्राचीन आत्माओं और बोंगाओं का विनाश और निष्कासन विशेषतः उनका जो केवल कष्ट पहुंचाते थे। पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों का परित्याग विशेषता उनका जिन्होंने आदिवासियों को अन्य लोगों से निम्न स्तरीय बना दिया था।
दूसरा चरण था ----- आचरण संबंधी विशेष नियमों का निर्धारण और नए धर्म का संगठन और उसे निश्चित रूप देना। परिष्कार से संबंध पहले चरण में जादू टोना और भूत डायनों से संबंध मान्यताओं को समाप्त करना भी आवश्यक समझा गया। उरांव को यह विश्वास है कि व्यक्ति और समाज का भविष्य अज्ञात व्यक्तियों पर आधारित है। यह अज्ञात शक्तियां मनुष्य के क्रियाकलापों को प्रभावित करती रहती है। अतः यदि लोग इन शक्तियों को संतुष्ट रखते हैं तो उन्हें लाभ होता है और यदि ये अज्ञात शक्तियां कुपित हो जाती है तो बीमारी, मृत्यु और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में कष्ट पहुंचाती हैं। अतः इन आत्माओं और बोंगाओं को समय-समय पर बलि चढ़ाकर संतुष्ट रखना आवश्यक है। बलि और कर्मकांड पर काफी व्यय होता था जो उरांव के लिए असहनीय था क्योंकि जनजातियों का आर्थिक जीवन पहले से ही कष्टमय था। उन्हें जमींदारों को सेवाएं देनी पड़ती थी और सरकार को भी कई प्रकार के कर देने पड़ते थे। 1820 से 1910 ईस्वी तक कई बार उन्हें दुर्भिक्ष ओं का सामना करना पड़ा। अल्पवृष्टि भी कष्टमय बना देती थी। सर्वाधिक प्रभावित भाग रांची जिला का पश्चिमी भाग था। जहां अधिकांश आबादी उरांवों की ही थी। अतः जब उरांव के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा हो गया तो संभवत पुराने देवी देवताओं और पुरानी जीवनशैली में उनका विश्वास घटता गया। वे एक नए देवता की तलाश करने लगे जो पुराने देवी देवताओं से अधिक शक्तिशाली हो और उनका कष्ट निवारक हो।

दुरात्माओं को शांत करने के उपाय-:दुरात्मा और कष्ट दाई देवी देवताओं को निष्कासित करने के लिए ताना भक्तों द्वारा किए गए उपाय लगभग उसी तरह के थे जो  उरांव मति द्वारा अपनाए जाते थे। उदाहरण के लिए नाच गाकर धर्मेश से यह प्रार्थना करना कि वह दुरात्माओं को निष्कासित कर दे। ऐसी प्रार्थना के समय ताना भगत तालियां बजाते थे और क्रमशः पैरों को उठाकर नाचते थे ।कभी-कभी यह प्रार्थना करते हुए गोल गोल घूमते थे, घुटनों के बल झुकते थे ,हाथ मिलाने के मुद्दा अपनाते थे और तब दूर आत्माओं तथा भूत प्रेतों को भाग जाने का आदेश देते थे। इसके लिए ताना भगत गांव के बाहर किसी खुली जगह में एकत्रित होते थे, जहां वे तब तक गाते और प्रार्थना करते थे। जब तक उस में से किसी एक में किसी दुरात्मा का प्रवेश ना हो जाता था। ऐसा व्यक्ति दौड़कर एक जगह जाता था जहां से सभी पहुंचते थे। इस जगह पर धर्मेश की प्रार्थना की जाती थी । सूर्य चंद्रमा पृथ्वी और सितारों का आवाहन किया जाता था। विशेष भक्ति से संपन्न व्यक्तियों-- जैसे बिरसा भगवान तक की प्रार्थना की जाती थी। मजे की बात यह थी कि जर्मन बाबा का भी आवाहन किया जाता था क्योंकि ताना परेशान हो सकते थे। उन दिनों जर्मनों की सफलता की चर्चा सर्वत्र हुआ करती थी और इन निरक्षर अज्ञानी किंतु धार्मिक दृष्टि से उत्साही भक्तों द्वारा जर्मन बाबा को एक अज्ञात किंतु शक्तिशाली देवता मान लिया गया। उनका विश्वास था कि अपने देवताओं के अतिरिक्त जर्मनों और हिंदुओं के देवताओं की पूजा कर वे जमींदारों और साहूकारों के चुंगल से बच सकते थे।

     हिंदू एवं ईसाइयों से तुलना

ताना भगत हिंदुओं और ईसाइयों की तुलना में अपनी स्थिति से दुखी थे। उनका विश्वास था कि उनकी दशा तभी सुधर सकती थी जब वे ईश्वर से तादात्म्य में स्थापित करें। इसके लिए उन्होंने कुछ कर्मकांडो  का भी आविष्कार किया और एक निश्चित आचार संहिता तैयार की। उनका कहना था कि सही कर्मकांड वही हो सकता था जो ईश्वर से सही संबंध स्थापित कर सकें। इसके लिए अपवित्र वस्तुओं का परित्याग कर शुद्ध जीवनयापन आवश्यक था तभी ईश्वर से संपर्क स्थापित किया जा सकता था और समस्त कष्टों से मुक्ति मिल सकती थी। उनकी आचार संहिता उरांव भक्तों अर्थात सोखाओं की आचार संहिता के समान है । भगत कर्मकांड के माध्यम से धर्मेश से तादात्म्य स्थापित करता है इसलिए वह शुद्ध जीवन अपनाता है और धर्मेश के प्रति समर्पित रहता है ईश्वर की कृपा प्राप्ति लिए पूजन से पहले शुद्ध होना आवश्यक है।

भगतों की प्रचलित परंपरा---
मांस भक्षण का परित्याग करना इसलिए आवश्यक है कि जीव ईश्वर की देन है। अतः पूजा और नैवेद्य अर्पण से पहले स्नान आवश्यक है। पूजन के पहले भोजन निषिद्ध है। पारंपरिक उरांव व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक धार्मिक समारोह में बलि, नैवेद्य और हंडिया का चढ़ाया जाना आवश्यक था। लेकिन ताना भक्तों ने यह सब बंद कर दिया। वह अपनी देवकुरी(मंदिर) में फूल मिष्ठान चढ़ाने लगा और अगरबत्ती तथा घी का दिया जलाने लगा। उसके लिए धर्म केवल भय का कारण देवताओं को संतुष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रक्रिया तो हृदय में धर्मेश को बैठा लेने की प्रक्रिया है। यह धर्म, प्रेम, पूजा और श्रद्धा पर आधारित है। ताना भगत के लिए पूर्वजों की आत्मा के अतिरिक्त सभी आत्मा दुरात्मा है और इसलिए उनका परिचय किया जाना चाहिए वह केवल सर्वोच्च देवता धर्मेश में विश्वास करता है और उसकी अनंत शक्ति का उपयोग स्वजनों की भलाई के लिए करता है। वह ना तो स्वयं मदिरा का सेवन करता है और न मदिरा सेवन करने वालों के साथ बैठता है । वही स्वपाकी होता है और दूसरों के द्वारा पकाये गए अन्न से परहेज करता है। इस तरह ताना भक्तों की आचार संहिता के समान है।
             ताना भक्तों द्वारा अखरा में नृत्य, जतराओं में शिकार और घुमकुरिया का भी परित्याग कर दिया गया।  वे न तो रंगीन वस्त्र पहनते थे और ना किसी प्रकार का आभूषण धारण करते थे। उन्होंने गोदना का भी परित्याग कर दिया।डाइयनकुरी और बोंगाओं को बलि को भी निषेध कर दिया गया क्योंकि ईश्वर का निवास तो हृदय में होता है। यदि उनके गीतों और प्रार्थनाओं पर विचार किया जाए तो लगता है कि सब कुछ उसके अंतः करण से नि:सृत होता है। धर्मेश प्रेम और पवित्रता का प्रतीक है जो ना केवल संपूर्ण ब्राह्मंड में व्याप्त है बल्कि व्यक्ति के हृदय में भी अवस्थित है। स्वजनों के प्रति प्रेम और सद्भावना सभी जीवो के प्रति दयाभाव, भोजन और आचरण की शुद्धता भक्तों को मध्यकालीन संत भक्तों की परंपरा में स्थापित करने का प्रयास किया गया हैनये धर्म के अनुयायियों की बड़ी संख्या जगह जगह एकत्रित होने लगी और सूर्योदय तक भूत प्रेतों के निष्कासन के अभियान चलने लगे जिससे जमींदार परेशान हो गए। तना भक्तों द्वारा जमींदारों को कर देना बंद कर दिया गया और उनके खेतों की जुताई भी बंद कर दी। अतः स्थानीय जमींदार और साहूकार ताना भक्तों के संभावित विद्रोह से आतंकित हो उठे और उन्होंने पुलिस में इसकी शिकायत की। पुलिस के पदाधिकारियों जो ना इनके गीत और प्रार्थना को समझते थे और ना जिन्हें ताना भक्तों के इन कर्मकांडो को देखने के लिए दिया जाता था इन्हें विद्रोही समझने लगे और उनकी सभाओं को गैरकानूनी मानने लगे । उनकी सभाओं पर भी प्रतिबंध लगाए गए और बहुतों को शांति भंग करने के नाम पर कचहरियों तक घसीटा गया।
               आंदोलन का विरोध
यह सब कुछ इस आंदोलन को रोकने के लिए किया जा रहा था। यह आंदोलन धीरे-धीरे समय में शिथिल पड़ता गया क्योंकि नया धर्म भी भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा में अक्षम सिद्ध हुआ। दूसरी ओर सरकारी दमन का चक्र भी चलता रहा। ताना भगत धीरे-धीरे समझने लगे कि केवल धार्मिक आवेग के बल पर आंदोलन को ना सिर्फ लोकप्रिय बनाया जा सकता था, इसके लिए एक राजनीतिक आधार की आवश्यकता थी। अतः जब महात्मा गांधी ने 1921 ईस्वी में सविनय अवज्ञा आंदोलन को प्रारंभ किया तो कुडु थाना के सिद्ध भगत के नेतृत्व में ताना भगत पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। ऐसा उन्होंने इसलिए किया कि उनकी दृष्टि में गांधीजी, जतरा भगत अथवा बिरसा भगवान के मूल उद्देश्यों में कोई अंतर नहीं था।

          आंदोलन का राजनीतिक इतिहास----
ताना भगत कांग्रेस की ओर इसलिए भी आकर्षित हुए कि वे कांग्रेस को गांधी का पर्यायवाची मानते थे। ताना भक्तों के कई दल गया,कोलकाता, लाहौर इत्यादि में होने वाले कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में शामिल हुए। विशेष महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन स्थानों तक की लंबी यात्राएं पांव पैदल की। उन्होंने चरखा को अपनाया और केवल खाद्य वस्तुओं का उपयोग करने लगे। उन्होंने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया तब से आज तक ताना भगतो के क्षेत्र में सर्वाधिक सक्रिय कांग्रेसी कार्यकर्ता इसी समुदाय से निकलते रहे हैं। वस्तुत: उनमें से कुछ यह भी समझते थे कि गांधी के रूप में जतरा भगत का पुनर्जन्म हुआ था। इस तरह एक आर्थिक और धार्मिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ,यह ताना भगत आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर एक राजनीतिक आंदोलन बन गया। कांग्रेसियों के रूप में इनकी अलग पहचान बनी। खद्दरधारी गांधी टोपी पहने शंख एवं घंटी बजाते ताना भगतों की टोली गांधीजी को अत्यंत प्रिय लगती थी। उन्होंने कहा भी था कि ताना भगत उनके सर्वाधिक प्रिय अनुयाई थे।

राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव -----

1930 ईस्वी में जब बारदोली आंदोलन शुरू हुआ तो ताना भगत भी इससे प्रभावित हुए और उन्होंने भी सरकार को कर देना बंद कर दिया। यह सब कुछ उन्होंने तब किया जब उन में ना तो कोई कांग्रेसी संगठन था और ना किसी कांग्रेसी कार्यकर्ता ने उन्हें ऐसा करने का परामर्श दिया था। उन्होंने जब यह देखा कि सरदार पटेल ने बारदोली में कर ना देने का अभियान छेड़ दिया है तो इन्होंने स्वत: कर देना बंद कर दिया। फलस्वरुप जमींदारों द्वारा उनकी जमीन नीलाम कराई गई और आज भी अनेक भूमिहीन ताना भगत है जो बटाईदारों अथवा कृषि मजदूरों की तरह जी रहे हैं। सभी आपदाओं के बावजूद भी आज भी कांग्रेस की घोर समर्थक है। इन स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना विशेष योगदान किया। फिर भी आज तक उनकी संपूर्ण भूमि नहीं लौटाई गई। जब बिहार में  कांग्रेस की सरकार बनी तब ताना भगतों की जप्त जमीन को लौटाने की कोशिश अवश्य की गई लेकिन यह प्रयास अपूर्ण सिद्ध हुआ। अब कुछ ही वर्ष पूर्व थाना भगतो की भूमि लौटाने संबंधी एक अधिनियम को भी पारित किया गया है। उन्हें कृषि के विकास के लिए अनुदान भी मिलने लगे हैं। फिर भी उनकी स्थिति में अपेक्षाकृत कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। इस संदर्भ में स्मरणीय बात यह भी है कि आज ताना भगतों में केवल उरांव ही नहीं है। मुंडा और खड़िया भी शामिल है फिर भी अभी भी उनमें उरांवों की संख्या ज्यादा है। जिससे यह आंदोलन आज भी काफी सफल रहा है।

Saturday, 12 December 2020

ताना भगत आंदोलन

ताना भगत आंदोलन



भाग-1, भाग -2 लिंक नीचे दिया गया है।ताना भगत आंदोलन भाग --2 यहां क्लिक कर पढ़ें। संघर्ष की वो दोस्ता जिसे जतरा भगत ने कैसे अंजम दिया।

संपूर्ण झारखंड में सरदारी लड़ाई और बिरसा आंदोलन की सफलता के कारण निराशा छाई हुई थी तब अवसर का लाभ उठाकर शोषक वर्ग और भी अधिक प्रबल हो उठा था भूमि विवाद बढ़ रहे थे सामान्य लोग सर उठाकर चल नहीं सकते थे बिगारी आम समस्या बन गई थी उन्हीं दिनों अंग्रेज गवर्नर के आरामगाह के रूप में पलामू जिले के नेतरहाट घाटी को विकसित किया जा रहा था पहाड़ों पर सड़क एवं बंगलों के निर्माण में आसपास के लोगों का उपयोग बलों तथा खतरों अर्थात पशुओं जैसा किया जा रहा था स्थानीय जमींदारों और पुलिस की सांठगांठ से आम आदमी के साथ मानवीय व्यवहार हो रहा था उसी कालखंड में देवी कृपा से जत्रा उड़ान का उदय हुआ।

1) जतरा (ताना) भगत का परिचय-:
झारखंड में सुविख्यात ताना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म अट्ठारह सौ अट्ठासी ईस्वी में गुमला जिले के बिशनपुर प्रखंड के अंतर्गत चिंगरी नावटोला में हुआ था। इनके पिता का नाम कोहरा भगत और माता का नाम लिवरी भगत तथा इनकी पत्नी बुधनी भगत थी। यद्यपि जतरा भगत की जन्म तिथि ठीक ठाक ज्ञात नहीं है किंतु आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को सामान्य मान्यता मिलने के कारण प्रत्येक वर्ष गांधी जयंती के दिन ही चिंगरी ग्राम में इनकी जयंती मनाई जाती है। और भी अधिक लिंक से पढें--https://alltimesupehitknowledge.blogspot.com/2020/09/blog-post_8.html

2) जतरा भगत की शिक्षा दीक्षा-:
मान्यता है कि गुरु ग्राम, हेसराग के श्री तुरिया भगत से तंत्र मंत्र की विद्या सीखने के क्रम में जतरा भगत को 1914 ईस्वी में अचानक आत्मबोध हुआ। उन्होंने जाना कि यदि तंत्र मंत्र से बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो सकती है और लोगों का आत्मविश्वास लौट सकता है तो क्यों ना इसके माध्यम से समाज में व्याप्त अत्याचार रूपी बीमारी को भी ठीक किया जाए। जनजातियों पर अंग्रेजी राज के अत्याचार, जमींदारों द्वारा बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं नाना प्रकार की कुरीतियों से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लेकर युवा जतरा उरांव जतरा भगत बन गया था।

3) ताना भगत आंदोलन का प्रारंभ-:
इस प्रकार ताना भगत आंदोलन की आरंभ अप्रैल 1914 ईस्वी में हुआ। वस्तुतः टाना भगत उरांवों की वह शाखा है , जिसमें कुडखों के मूल धर्म कुडुख धर्म को अपना लिया था। 'ताना' शब्द का अर्थ तनना या खींचना है। ताना भगत अपनी गिरी हुई स्थिति से खिन्न थे और इस में परिवर्तन लाना चाहते थे। उन्होंने भली प्रकार समझ लिया था कि अपनी स्थिति सुधारने का एकमात्र तरीका ईश्वर की आज्ञा मानना और उससे तादात्म्य स्थापित करना था। ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने का सही मार्ग सभी अपवित्र वस्तुओं का परित्याग करना और जीवन की शुद्धता था। इसलिए उन्होंने उन सभी वस्तुओं का परित्याग कर दिया, जिन्हें वे अशुद्ध समझते थे और जादू टोना का भी विरोध किया। उनका विश्वास था कि धर्मेश(ईश्वर) समान रूप से देखता है कि लोग उनकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं और वह उन वस्तुओं का भी वह विनाश करता है जो लोगों को हानि पहुंचाती है। ताना भक्तों की अधिकांश आबादी झारखंड के बिशुनपुर घाघरा, गुमला, रायडीह, चैनपुर, पालकोट, सिसई, लापुंग तथा मांडर आदि में स्थित है। इनकी कुल संख्या लगभग 10,000 है जो प्राय: 150 परिवारों में विभाजित है। उस समय जब जतरा भगत ने इस आंदोलन को शुरू किया था तब वह मती (ओझा) का प्रशिक्षण ले रहा था। मान्यता है कि वह एक रात जब प्रशिक्षण लेकर लौट रहा था तब धर्मेश(ईश्वर) ने दर्शन दिया और कहा कि वह मतिभाव सीखना बंद कर दें और भूत प्रेत तथा बलि इत्यादि में विश्वास करना त्याग दें। इसके अतिरिक्त वह मांस मदिरा का भी परित्याग कर दें और खेतों में हल चलाना बंद कर दें क्योंकि इससे गायों - बैलों को केवल तकलीफ होती है और अकाल एवं गरीबी से भी छुटकारा नहीं मिलता है।

4) जतरा की शिक्षाएं-:
जतरा ने लोगों से कहना आरंभ किया कि ईश्वर यह नहीं चाहता कि लोग अब जमींदारों एवं धर्मावलंबियों तथा गैर आदिवासियों की यहां कुलियों एवं मजदूरों का काम करें। उसने यह भी घोषणा की कि ईश्वर ने उसे जनजातियों का नेतृत्व सौंपा है और उसे उन्हें समझाने को कहा है कि वे धर्मेश अर्थात ईश्वर की पूजा करें क्योंकि तभी उनकी इच्छाएं पूर्ण होंगी।
         इस प्रकार ताना भगत ने ना उन विचारों को व्यक्त किया जो आदिवासियों के मानस को काफी समय से उद्वेलित कर रहे थे अन्य शब्दों में उसने एक निश्चित जनजातीय धर्म स्थापित करने में लोगों की सहायता की। वस्तुतः इस प्रक्रिया की शुरुआत बिरसा मुंडा के समय में ही हो गई थी अब केवल जतरा तथा अन्य परवर्ती जनजातियां मसीहा उन्हें उस परिकल्पना को मूर्त रूप प्रदान किया था।

5) आंदोलन का प्रचार-:
!)-हनुमान उरांव द्वारा प्रचार -:भाग दो क्रमशः आगे यहां क्लिक कर पढ़ें----

Friday, 11 December 2020

संथाल जनजाति एक नजर।

 संथाल जनजाति संक्षिप्त परिचय।



झारखंड की संथाल जनजाति मुख्यतः संथाल परगना क्षेत्र ( जामताड़ा,देवघर,पाकुड़, साहेबगंज,गोड्डा और दुमका) में केन्द्रित है। जहां इसकी आबादी लगभग 12 लाख से अधिक है। किन्तु छोटा नागपुर क्षेत्र में भी इसकी आबादी 5 लाख से कम नहीं है। यद्यपि यह लोग संताली भाषा बोलते हैं, जिसका संबंध आस्ट्रो एशियाई भाषा से है तथापि इनकी बोली छोटा नागपुर के दूसरे आदिवासियों से मिलती जुलती है। इनका पहनावा अत्यंत सादा होता है। गरीब संथाल केवल एक टुकड़ा कपड़ा से अपना सिर ढक लेते  है। अमीर घराने के लोग धोती और कुर्ता पहनते हैं। इनकी स्त्रियां साधारणतः मोटे कपड़े की साड़ियां पहनती है। इनका मुख्य वस्त्र पॉची प्रहंद है। प्रहंद से अपना शरीर का निचला भाग ढकती है और प्राची को शरीर के ऊपरी भाग में पहनती है।

संथालो में गांव को आतो कहा जाता है।
गांव के मुखिया को मांझी का जाता है।
गांव का धर्मस्थल जोहार थान कहलाता है।
गृह देवता को ओडाग बोंगा कहा जाता है।
संभालू का मुख्य भोजन दाका उरू अर्थात दाल भात है।
दालों में कुर्थी मुख्य था।
बासक्याक (जलपान), माजवान( दोपहर का भोजन) और कदोक( रात का भोजन) होता था।
संथाल युवतियां तथा महिलाएं साधारणतः कांसा, पीतल, तांबा तथा चांदी के आभूषण पहनती थी। हाथों में सांखा तथा सकोम, बाहों में खागा, गले में हंसूली तथा सकडीं, कानों में पानरा, नाक में मकड़ी, पांवों में बांक-बंकी तथा पांव की अंगुलियों में बटरियां प्रमुख आभूषण थे।
युवक हाथों में टीडोर, बाहों में खागा तथा कानों में कुंडल पहनते थे।
वंशी, ढोल,नगाड़ा तथा केंन्दरा प्रमुख वाद्य यंत्र थे।
पोन  वधू मूल्य था।
पुत्र जन्म के पांचवे दिन तथा कन्या जन्म के तीसरे दिन छठियार मनाया जाता था।
प्रायः पहली संतान का दादा दादी तथा दूसरी का नाना नानी के नाम पर नामांकन किया जाता था।
विवाह से पूर्व चाचो छठियार मनाया जाता था, जिसमें बच्चे को अपनी जाति की प्राप्ति होती थी।
संथाल जनजाति अंतर्विवाही जनजाति थी। सम गोत्र में विवाह निषेध था।
तलाक होने पर वधू मुझे लौटा दिया जाता था।

विवाह के प्रकार---:
सदाई बापला-: इस प्रकार के विवाह प्रायः वर-वधू की पसंद के आधार पर ही सुनिश्चित होते थे।
गोलाइटी बापला-:इस प्रकार के विवाह में जिस परिवार में बेटी ब्याही जाती थी उसी परिवार से पतोह लाई जाती थी। इस प्रकार के विवाह में पोन नहीं लिया जाता था। वधू मूल्य से बचने के लिए दो परिवार के लड़के लड़कियों का बिना पोन दिए विवाह कर दिया जाता था।
टुनकी दिपिल बापला-: इस प्रकार का विवाह प्रायः गरीब परिवारों के बीच संपन्न होता था। कन्या को वर के घर लाकर सिंदूर दान कर विवाह संपन्न हो जाता था।
धरदी जावांय बापला-: इस प्रकार के विवाह में पुत्रहीन व्यक्ति कन्या के गांव जाकर उसे अपने यहां ले आता था। वधू के लिए पोन नहीं देना पड़ता था तथा विवाह के बाद दामाद को ससुराल में ही रहना पड़ता था।
अपगिर बापला-: लड़का लड़की में प्रेम हो जाने पर पंचायत दोनों के अभिभावकों को विवाह संपन्न कराने के लिए कहती थी। यदि वे शादी के लिए तैयार हो जाते थे तो गांव के मांझी एवं पंचायत के सदस्यों के सामने सिंदूर लगाकर शादी संपन्न हो जाती थी। इस अवसर पर लड़के के पिता को गांव वालों को भोज देना पड़ता था।
इतुत बापला -: जब लड़की के माता-पिता उसकी पसंद के लड़के के साथ विवाह की अनुमति नहीं देते थे तो लड़का मेले अथवा किसी अवसर पर लड़की के माथे पर सिंदूर लगा देता था लड़की के माता-पिता इसकी जानकारी मिलने पर लड़के के गांव जाते थे तथा वधू मूल्य मिलने पर विवाह संपन्न हो जाता था।
निर्बलोक बापला-: इस प्रकार के विवाह में लड़की हठकर अपनी पसंद के लड़के के घर रहने लगती थी। लड़का अथवा उसके परिवार के सदस्य बल प्रयोग कर लड़की को घर से निकालने की चेष्टा करते थे। फिर भी यदि लड़की जमी रह जाती थी तो जोगमांझी को सूचित किया जाता था। वह उनका विवाह संपन्न करा देता था।
बहादुर बापला-: इस प्रकार के विवाह में लड़का लड़की जंगल में भाग जाते थे और एक दूसरे को माला पहनाते थे । घर लौट कर अपने को एक कमरे में बंद कर लेते थे। इसके बाद यह माना जाता था कि उनका विवाह संपन्न हो चुका है।
राजा राजी बापला-: इस प्रकार के विवाह में लड़का लड़की गांव के मांझी के पास जाते थे। मांझी उन्हें लड़की के घर ले जाता था तथा गांव के वयोवृद्ध लोगों के समक्ष वह औपचारिक रूप से लड़की की स्वीकृति प्राप्त कर लेता था। लड़का लड़की के माथे पर सिंदूर लगा देता था और इस प्रकार विवाह संपन्न हो जाता था।
सांगा बापला-: इस प्रकार के विवाह में विधवा या तलाकशुदा स्त्री का विवाह विदुर अथवा परित्यक्त व्यक्ति के साथ संपन्न होता था। वर वधु स्वयं ही अपना विवाह तय करते थे कुछ वधू मूल्य भी दिया जाता था। किसी निश्चित तिथि को वधू को वर के घर लाकर शादी करा दी जाती थी।
कीरिंग जावांय बापला-:जब लड़की दूसरे पुरुष से गुप्त रूप से गर्भवती हो जाती थी तो इस लड़की से विवाह के इच्छुक व्यक्ति को कुछ धनराशि देख कर शादी कर दी जाती थी। वधू के माता-पिता द्वारा उसे वैधानिक जीवन प्रारंभ करने के लिए गाय, बैल तथा कुछ द्रव्य भी प्रदान किया जाता था।
                   मृत्यु संस्कार
अंत्येष्टि के अंतर्गत दाह अथवा दफन की दो विधियां थी।
जलाते समय चिता उत्तर दक्षिण दिशा में बनाई जाती थी। मृतक का सिर- दक्षिण की और रखा जाता था। सब को चिता पर रखने के बाद चिता की कोठी पर चूजे की बलि चढ़ाई जाती थी। बाकि हिन्दू रिति अनुसार था।
         गोत्र
संथाल जनजाति बहिर्विवाही गोत्रों में विभक्त थी। गोत्र गोत्रार्द्ध अथवा सिव में बंटे होते थे। संथाल अपने गोत्र तथा सिव में विवाह नहीं करते थे। किंतु माता-पिता के शिव में विवाह हो सकते थे। संताल पिता का गोत्र पाता था माता का नहीं।
        गोत्र चिन्ह के नाम पर गोत्र का नामांतरण होता था।पितृ वंशी गोत्रों की प्रधानता थी गोत्रों में प्रमुख थे हासंदा, मुर्मू, किस्कू, हेम्ब्रम,मरांडी, सोरेन, टुडू,बेसरा, पौडिया, बसके तथा चोड़े इत्यादि।
                     नतेदारी
नातेदारी रक्त तथा विवाह संबंधों पर आधारित थी।
पति के बड़े भाई, बड़ी ननद को देव तुल्य माना जाता था उनकी चारपाई पर बैठने तक की मनाही थी।
पति के बड़े भाई का स्पर्श हो जाने मात्र से आरूप जोगा नामक प्रायश्चित का विधान था।
                 बिटलाहा

संथालों में समगोत्रीय यौन संबंध निषिद्ध था। निषिद्ध यौन संबंध स्थापित होने पर अपराधियों को बीटलाहा अर्थात जाती बहिष्कृत किए जाने की सजा दी जाती थी।विठला की अंतिम स्वीकृति परगनैत द्वारा दी जाती थी। विटलाहा सुनिश्चित किए जाने के बाद गांव का योग मांझी या कोई एक अन्य व्यक्ति साल की टहनी लेकर प्रायः 1 सप्ताह पहले निकटवर्ती जनजाति हाट में जाता था। साल की टहनी में जितनी पत्तियां रहती थी इतने ही दिनों बाद विटलाहा की तिथि मानी जाती थी। गैर संथाल के साथ यौन संबंध करने वाले अभियुक्त को निश्चित ही गांव छोड़ना पड़ता था।
               धर्म
संथाल जनजाति का धार्मिक जीवन अनेक देवी-देवताओं, प्रेत- आत्माओं में विश्वास तथा पर्व त्योहारों से जुड़ा हुआ था।
सनातन संथालो को बोंगा  होड कहा जाता था।
संथालों का सबसे बड़ा देवता सिंगबोंगा (सूर्य) था।
सिंगबोंगा के बाद मरंगबुरू का स्थान था।
अन्य बोंगा हापडामको, गोसाई एरा, मोडेको,  तूईको, जहेर एरा, मांझी हडाम बोंगा, ओडाक बोंगा(गृह देवता) तथा अबगे-बोंगा(परिवार का देवता) थे।
मांझी हडाम बोंगा का निवास स्थान मांझी जान कहलाता था।
प्रतीक संथाल गांव के मध्य में एक चौकोर चबूतरा होता था जिसे मांझी थान कहा जाता था इस जगह गांव के मांझी के भीतर प्रतीक रूप में पत्थर के टुकड़ों के रूप में स्थापित रहते थे। गांव की पंचायत भी प्रायः यहीं बैठा करती थी।
जाहेर थान गांव से थोड़ा हट कर साल अथवा महुआ पेड़ों के बीच अवस्थित होता था, प्रमुख देवी देवता यही निवास करते थे।
ईसाई संथालो को उमेंहाड कहा जाने लगा।
                पर्व एवं त्योहार
गांव का नायके पुजारी सभी लोगों की ओर से व्रत रखता था तथा पूजा-अर्चना करता था।
एरोक पर्व आषाढ़ मास में मनाया जाता था।(यह पर्व बीज के भली-भांति उगने के लिए मनाया जाता था)।
सावन मास में धान की फसल हरि हो जाने पर हरियाड पर मनाया जाता था।
अगहन मास में जापाड पर्व मनाया जाता था। इस पर्व पर जाहेरथान में सूअर की बलि चढ़ाई जाती थी और अन्न की अभिवृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती थी।
पौष मास में धान की फसल कट जाने पर सोहराय पर्व आता था। यह संथालों का सबसे पवित्र पर्व था। यह पांच दिवसीय पर्व था जिसमें तरह तरह के विधि विधान थे।
पौष मास के ही अंतिम दिनों में साकरात पर्व मनाया जाता था। यह 2 दिनों का पर्व था। पहला दिन मछलियां केकड़े तथा चूहे पकड़े जाते थे। दूसरे दिन जंगली पशु पक्षियों का शिकार होता था।
बाहा पर्व दूसरे नंबर का महत्वपूर्ण पर्व था जो फाल्गुन मास में साल वृक्षों पर फूल लगते ही मनाया जाता था । यह मुंडाओं तथा उरांवों के सरहुल पर्व की तरह था। वस्तुतः यह संथालों का वसंतोत्सव था। यह 3 दिनों का त्यौहार था।
चैत्र तथा वैशाख मास में बंधना पर्व मनाया जाता था। सभी देवी - देवताओं की पूजा कर बलि चढ़ाई जाती थी। मित्रों, सगे- संबंधियों से मिलना- जुलना तथा पीना, नाचना - गाना सप्ताह भर चलता रहता था।

Thursday, 10 September 2020

चेरो से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य।

 चेरो

----चेराओं का संबंध द्रविड़ जनजाति से है।
---- इनकी अधिकांश आबादी पलामू में केन्द्रित थी।
--- चेराओं के नाक कान छेदने का कार्य मलहोरीन करती थी।
--- कान में दो दिन छेद करवाते थे पर नाक में दाहिने ओर एक छेद करवाना पसंद था। गोदना गोदवातीं थी, जो दस वर्ष तक करवा लिया जाता था।
----मकान के दक्षिण- पश्चिम कोने में चुल्हा होता था।
--- चेरो समाज पितृसत्तात्मक समाज था।
---- विधवा अपने देवर से शादी कर सकती थी।
---- विधवा को भरण-पोषण के लिए पारिवारिक सम्पत्ति का बराबर का हिस्सा दिया जाता था।
--- बड़े चेरो बबुआन कहे जाते थे।
---- चेरो महिला न तो शव यात्रा में शामिल हो सकती थी और न अक्सर तीर्थाटन के लिए निकल सकती थी। गांव के सामूहिक धार्मिक अनुष्ठानों में भी उसकी भागीदारी नहीं के बराबर थी। पंचायत में भी इनका कोई स्थान न था।
---- सउरीघर का सम्बंध प्रसव कक्ष से था।
----- चेराओं में बाल विवाह की प्रथा नहीं थी पर सामान्यतः 12 वर्ष की आयु तक बालक-बालिकाओं का विवाह हो जाता था।
--- लड़कों को 100-1000 रूपये तक तिलक देने की प्रथा थी पर जिन लड़कों को तिलक मिलने की संभावना नहीं रहती थी वे स्वयं कन्या को वधू मूल्य देते थे जिसे दस्तूरी कहते थे।
----- विवाह से पूर्व कन्या अवलोकन की प्रथा चेराओं में नहीं थी।
----- इनमें सगोत्र विवाह वर्जित था।
------ विवाह के तीन तरीके थे। डोला, घरांऊ(कन्या पक्ष के गरीब होने पर) और चढ़ाऊं (कन्या पक्ष के सम्पन्न होने पर)।
----- प्रत्येक गांव में एक बैगा(वंशानुगत) तथा कुछ में डिहवार भी होता था। बैगा देवी देवताओं की तथा डिहवार कुपित आत्माओं को पूजा करते थे।
----- भैयारी पंचायत के पदाधिकारी थे-- महतो या सभापति, छरीदार और पंच।ये पद वंशानुगत थे पर बाद में चुनाव से चयन किए जाने लगे। इनका काम पारंपरिक नियमों के उल्लंघन को रोकना, ठीक समय पर देवी- देवताओं की पूजा कराना।
----- कन्या यदि विवाह के वक्त विदा नहीं होता था तो उसका गवना होता था, बाद में पहली बार ससुराल जाते वक्त दोंगा होने का प्रथा था।
------ परित्यक्ता का पुनर्विवाह सगाई कहा जाता था।
----- चेरो हिन्दू पड़ोसियों की देखा देखी छठ व्रत में सूर्य की पूजा करते थे। रामनवमी भी मनाते थे।
---- बैशाख में सरहूल पूजा होती थी। इस मौके पर गमहेल स्थान में बैगा-खस्सी-मुर्गा तथा तपावन चढ़ाता था। आषाढ़ मास में हरियारी पूजा होती थी। श्रावण में  सावनी पूजा तथा अच्छी वर्षा के लिए दुआर पार की पूजा होती थी। भाद्रपद मास में कर्म पूजा, अनन्त पूजा का प्रचलन था। जन्माष्टमी,जितिया,तीज व्रत,कार्तिक मास में सोहराई पूजा,पौष मास में तिलसंक्रांत पूजा, फाल्गुन में फगुआ आदि उत्सव मनाये जाते थे।

खरवारों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य।

 खरवार

---)) खरवार की अधिकतर संख्या पलामू, रांची तथा हजारीबाग में थी।

---)) खरवार परंपरा के अनुसार वे खेरीझार से आते थे , इसलिए खरवार कहलाये।

-)) खरवारों का प्रमुख पेशा कृषि धर्म था।

-))) इनमें बाल विवाह को श्रेष्ठ माना जाता है।वधू मूल्य देने की प्रथा थी।

-)) खरवारों की अपनी पंचायत होती थी।जिसके सदस्य गांव के ही वरिष्ठ पुरुष होते थे।

-)) कई गांव मिलकर चट बनता था जिसका प्रमुख प्रधान कहा जाता था। इसका पद वंशानुगत होता था।

-))) खरवारों में घुमकुरिया जैसी कोई संस्था नहीं थी।

-)) कोई स्त्री निःसंतान थी तो उसकी बहन का विवाह जीजा के साथ हो सकता था। ऐसे विवाह को 'रिजनिया' कहा जाता था।

-))) पलामू तथा रांची में खरवार ग्राम पंचायत का प्रमुख मुखिया कहा जाता था, किंतु शाहाबाद में उसे बैगा ही कहते थे।

-))) बैगा ही प्रत्येक गांव में फसल बोने अथवा काटने का शुभारंभ करता था।

-)) खरवार मुखिया गांवों से हूं राजस्व एकत्रित कर जमींदार को देता था।

--)) खरवार पंचायत एक सर्वमान्य संस्था थी और 1947 ई तक खरवारों के अधिकांश पारस्परिक झगड़े पंचायत स्तर पर ही निपटा लिए जाते थे।

--)) 

Tuesday, 8 September 2020

टाना भगत आंदोलन



              टाना भगत आंदोलन(1914)
-) टाना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म 1888 ई में गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के अंतर्गत चिंगरी नावाटोली में हुआ था।
-) पिता का नाम कोहरा भगत और माता का नाम लिबरी भगत था। पत्नी बुधनी भगत थी।
-) प्रत्येक वर्ष गांधी जयंती के दिन चिगरी नावाटोला में इनकी जयंती मनाई जाती है।
-) इनको आत्म बोध की प्राप्ति 1914 ई में गुरु ग्राम हेसराग के श्री तुरीया भगत से तंत्र -मंत्र की विद्या सीखने के क्रम में हुआ।
-)टाना भगत आंदोलन की शुरुआत अप्रिल 1914 ई में हुई।
-) टाना शब्द का अर्थ है टानना या खींचना।
-) टाना भगतों की अधिकांश आबादी बिशनपुरा,घाघरा, गुमला,रायडीह, चैनपुर,पालकोट,सिसई, लापुंग,कुडूं तथा मांडर में केन्द्रित है। इनकी कुल संख्या प्रायःदस हजार है जो लगभग 150 परिवारों में विभक्त है।
-) टाना भगत मांस खा सकते थे मांसभक्षी भगत जुलाहा भगत कहे गये ये मांडर क्षेत्र में पाते जाते है। जिन लोगों ने शिबू भगत का अनुखरण नहीं किया वे अरूवा भगत कहलाये क्योंकि वे केवल अरवा चावल ही खाते थे।
-) घाघरा क्षेत्र में बेलगाडा़ निवासी बलराम भगत ने भगत सम्प्रदाय की बागडोर संभाली।
-) बिशनपुर थाना के उरावां ग्राम के भीखू भगत ने बिष्णु भगत सम्प्रदाय को जन्म दिया।
-) 1961 में जतरा भगत को जेल हुई और इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने सिद्धांतों का प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाते रखेगा।पर जेल में मिली प्रताड़ना की वजह से दो मास के भीतर उसकी मौत हो गई।
-) आंदोलन नहीं रूका और 1916 के अंत तक रांची जिला के दक्षिण पश्चिम भागों से मध्य भाग होते हुए विशेषतः बेड़ी,कुडुं,मांडर, थानों में तथा उत्तर में पलामू जिला तक फैला।

-)भगतों ने राजा के समक्ष चार प्रस्ताव रखा ---


1----उन्हें स्वशासन प्रदान किया जाय।
2------राजा का पद समाप्त किया जाय।
3------समानता स्थापित किया जाय।
4-------भूमि कर समाप्त किया जाय।
-) महात्मा गांधी ने 1921 ई में सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारंभ किया तो कुडुं थाना के सिद्धु भगत के नेतृत्व में टाना भगत पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये।
-) टाना भगतों में केवल उरांव ही नहीं है उनमें मुंडा और खड़िया भी शामिल हैं।फिर भी सबसे ज्यादा संख्य में उरांव ही हैं।
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